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Arohi Tripathi
maqsad sala-e-aam hai phir ehtiyaat kyun
maqsad sala-e-aam hai phir ehtiyaat kyun | मक़्सद सला-ए-आम है फिर एहतियात क्यूँँ
- Arohi Tripathi
मक़्सद
सला-ए-आम
है
फिर
एहतियात
क्यूँँ
उन
सेे
हुई
है
बात
तो
फिर
इनसे
बात
क्यूँँ
- Arohi Tripathi
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तुम्हारे
ख़त
को
जलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
ये
दिल
बाहर
निकलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
तुम्हारा
फ़ैसला
है
पास
रुकना
या
नहीं
रुकना
मेरी
क़िस्मत
बदलने
में
ज़रा
सा
वक़्त
बाकी
है
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Tanoj Dadhich
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मैदाँ
में
हार
जीत
का
यूँँ
फ़ैसला
हुआ
दुनिया
थी
उन
के
साथ
हमारा
ख़ुदा
हुआ
Jameel Malik
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भूक
से
या
वबास
मरना
है
फ़ैसला
आदमी
को
करना
है
Ishrat Afreen
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बिछड़ते
वक़्त
भी
हिम्मत
नहीं
जुटा
पाया
कभी
भी
उस
को
गले
से
नहीं
लगा
पाया
किसी
को
चाहते
रहने
की
सज़ा
पाई
है
मैं
चार
साल
में
लड़की
नहीं
पटा
पाया
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Shadab Asghar
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सब
की
हिम्मत
नहीं
ज़माने
में
लोग
डरते
हैं
मुस्कुराने
में
एक
लम्हा
भी
ख़र्च
होता
नहीं
मेरी
ख़ुशियों
को
आने
जाने
में
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Vishal Singh Tabish
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लड़
सको
दुनिया
से
जज़्बों
में
वो
शिद्दत
चाहिए
इश्क़
करने
के
लिए
इतनी
तो
हिम्मत
चाहिए
कम
से
कम
मैंने
छुपा
ली
देख
कर
सिगरेट
तुम्हें
और
इस
लड़के
से
तुमको
कितनी
इज़्ज़त
चाहिए
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Nadeem Shaad
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करके
थोड़ी
हिम्मत
लिखना
चाहता
हूँ
नेताओं
को
लानत
लिखना
चाहता
हूँ
जिसको
पढ़कर
सारे
तुझ
सेे
प्यार
करें
तेरी
ऐसी
सीरत
लिखना
चाहता
हूँ
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Sanskar 'Sanam'
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सफ़र
में
मुश्किलें
आएँ
तो
जुरअत
और
बढ़ती
है
कोई
जब
रास्ता
रोके
तो
हिम्मत
और
बढ़ती
है
Nawaz Deobandi
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अपनी
दुनिया
भी
चल
पड़े
शायद
इक
रुका
फ़ैसला
किया
जाए
Madan Mohan Danish
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कौन
डूबेगा
किसे
पार
उतरना
है
'ज़फ़र'
फ़ैसला
वक़्त
के
दरिया
में
उतर
कर
होगा
Ahmad Zafar
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फ़साने
से
हक़ीक़त
बन
गए
हैं
हमारी
वो
मोहब्बत
बन
गए
हैं
मिरी
तो
साँस
चलती
हैं
उन्हीं
से
हमारी
वो
ज़रूरत
बन
गए
हैं
बड़ी
बेकार
आदत
लग
गई
है
मगर
वो
ख़ास
आदत
बन
गए
हैं
मुझे
चाहत
नहीं
ज़र्रा
बराबर
मिरे
दिल
की
हुकूमत
बन
गए
हैं
नमाज़ी
बन
गए
हैं
बाद
काफ़िर
हमारी
जब
इबादत
बन
गए
हैं
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Arohi Tripathi
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आज
फिर
तुम
हिजाब
में
आए
यार
जैसे
कि
ख़्वाब
में
आए
मैं
पढूंँगी
तुम्हें
रिवायत
में
प्यार
जैसे
किताब
में
आए
मौत
आई
हमें
ख़बर
नइँ
थी
ज़िंदगी
क्यूँ
अज़ाब
में
आए
अब
इबादत
हमें
बचाएगी
रार
जानी
हिसाब
में
आए
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Arohi Tripathi
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जब
कभी
देखो
यही
वो
सोचता
है
मैं
नहीं
मिलने
गया
तो
सोचता
है
Arohi Tripathi
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वो
मुसाफ़िर
कहाँँ
गया
जानी
यार
क़ाफिर
कहाँँ
गया
जानी
Arohi Tripathi
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हो
नहीं
सकती
कभी
लाचार
औरत
चुप
कहाँ
रहती
ही
जब
हो
चार
औरत
मर्द
ने
समझा
जिसे
कमज़ोर
हिस्सा
मर्द
के
ख़ातिर
बनी
दीवार
औरत
एक
औरत
से
हुई
तख़लीक़
जिसकी
और
मर्दों
ने
किया
मिस्मार
औरत
जो
कभी
सीता
कभी
राधा
बनी
थी
नूर
सी
फैली
हुई
घर
बार
औरत
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Arohi Tripathi
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