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Amit Tyagi
lat KHud ki laga ke phir dheere se bhulaana bhi
lat KHud ki laga ke phir dheere se bhulaana bhi | लत ख़ुद की लगा के फिर धीरे से भुलाना भी
- Amit Tyagi
लत
ख़ुद
की
लगा
के
फिर
धीरे
से
भुलाना
भी
मुश्किल
तो
नहीं
इतना
ये
इश्क़
निभाना
भी
जीने
की
उदासी
में
अब
छोड़
दिया
हमने
अन्धों
से
भरी
बस्ती
में
दीप
जलाना
भी
आँखों
को
तेरी
तकना
स्याही
के
बिखरने
तक
आँसू
को
बचाना
भी
इक
शे'र
बनाना
भी
लहरों
से
अकेले
में
लड़ना
भी
मनाना
भी
नदियों
से
समुंदर
को
हर
राज़
छिपाना
भी
- Amit Tyagi
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इक
मुहब्बत
से
भरी
उस
ज़िंदगी
के
ख़्वाब
हैं
पेड़
दरिया
और
पंछी
तेरे
मेरे
ख़्वाब
हैं
Neeraj Nainkwal
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क्या
दुख
है
समुंदर
को
बता
भी
नहीं
सकता
आँसू
की
तरह
आँख
तक
आ
भी
नहीं
सकता
तू
छोड़
रहा
है
तो
ख़ता
इस
में
तेरी
क्या
हर
शख़्स
मेरा
साथ
निभा
भी
नहीं
सकता
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Waseem Barelvi
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तिरी
सदा
का
है
सदियों
से
इंतिज़ार
मुझे
मिरे
लहू
के
समुंदर
ज़रा
पुकार
मुझे
Khalilur Rahman Azmi
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तूफ़ानों
से
आँख
मिलाओ
सैलाबों
पे
वार
करो
मल्लाहों
का
चक्कर
छोड़ो
तैर
के
दरिया
पार
करो
Rahat Indori
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चल
दिए
घर
से
तो
घर
नहीं
देखा
करते
जाने
वाले
कभी
मुड़
कर
नहीं
देखा
करते
सीपियां
कौन
किनारे
से
उठा
कर
भागा
ऐसी
बाते
समुंदर
नहीं
देखा
करते
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Unknown
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रात
के
जिस्म
में
जब
पहला
पियाला
उतरा
दूर
दरिया
में
मेरे
चाँद
का
हाला
उतरा
Kumar Vishwas
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चलो
न
फिर
से
दरिया
के
नज़दीक
चलें
चलो
न
फिर
से
डुबकी
साथ
लगाएँगे
Atul K Rai
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मेरे
जुनूँ
का
नतीजा
ज़रूर
निकलेगा
इसी
सियाह
समुंदर
से
नूर
निकलेगा
Ameer Qazalbash
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बहरस
ख़ारिज
हूँ
ये
मालूम
है
पर
तुम्हारी
ही
ग़ज़ल
का
शे'र
हूँ
Gyan Prakash Akul
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ज़िन्दगी
पर
लिख
दिया
था
नाम
मैंने
राम
का
और
फिर
दुख
के
समुंदर
पार
सारे
हो
गए
Tanoj Dadhich
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ख़ुशहाल
ज़िंदगी
की
अधूरी
तलाश
में
मैंने
बना
लिया
है
ठिकाना
ही
लाश
में
वो
देखता
है
मुझ
को
मुहब्बत
में
इस
तरह
जोकर
को
देखते
हैं
जैसे
लोग
ताश
में
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Amit Tyagi
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यूँँ
तो
क्या
क्या
नहीं
लिखा
मैंने
बस
वो
सपना
नहीं
लिखा
मैंने
शे'र
होता
मिरा
मुकम्मल
पर
उस
पे
मिसरा
नहीं
लिखा
मैंने
इक
कहानी
बयान
करता
था
उसका
चहरा
नहीं
लिखा
मैंने
नाम
कोई
बता
नहीं
पाया
सो
वो
रिश्ता
नहीं
लिखा
मैंने
होंठ
थे
शहद
से
मिठे
फिर
भी
उस
को
ख़तरा
नहीं
लिखा
मैंने
रो
पड़ी
आग
भी
झुलस
मुझ
सेे
ख़ुद
को
दरिया
नहीं
लिखा
मैंने
जब
हुई
गुफ़्तगू
ख़ुदा
ने
कहा
तेरा
मिलना
नहीं
लिखा
मैंने
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Amit Tyagi
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प्यार
फिर
इक
बार
कर
तोड़
हर
दीवार
कर
तू
गज़ल
बन
इश्क़
में
हर्फ़
बन
इज़हार
कर
छोड़
दे
हथियार
सब
आँख
से
बस
वार
कर
चाँद
से
पा
रौशनी
बन
सितारा
प्यार
कर
है
ख़ता
अरमान
की
दिल
न
तू
तक़रार
कर
जा
चली
जा
छोड़
कर
शब
न
तू
बेकार
कर
याद
आएगी
न
अब
आज
ये
इक़रार
कर
कर
अता
दे
घाव
फिर
आज
फिर
इनकार
कर
दिल
सफ़ीना
है
'अमित'
मौज
से
बस
रार
कर
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Amit Tyagi
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काग़ज़
से
बने
गुल
ये
दिखाने
के
लिए
हैं
वादे
ये
फ़क़त
सब
को
लुभाने
के
लिए
हैं
रावन
है
बसा
आज
तो
हर
ओर
बशर
में
ये
राम
से
चेहरे
तो
ज़माने
के
लिए
हैं
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ओढ़
के
अश्कों
को
सोया
चैन
से
है
यार
तू
किस
कहानी
का
बनेगा
अब
नया
किरदार
तू
हम
तो
इस
बाज़ार
में
लूटे
गए
हैं
यार
पर
ख़ास
अच्छा
तो
नहीं
लगता
है
साहूकार
तू
देखना
ये
म्यूचुअल
का
इक
नया
सा
दौर
है
बन
न
जाना
हर
किसी
के
वास्ते
बाज़ार
तू
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Amit Tyagi
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