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Amaan Pathan
kya mushkil hai yaar main ghar men baithoon ya baahar jaaun
kya mushkil hai yaar main ghar men baithoon ya baahar jaaun | क्या मुश्किल है यार मैं घर में बैठूँ या बाहर जाऊँ
- Amaan Pathan
क्या
मुश्किल
है
यार
मैं
घर
में
बैठूँ
या
बाहर
जाऊँ
अंदर
बहुत
अँधेरा
है
और
बाहर
बहुत
उजाला
है
- Amaan Pathan
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मिलन
का
इक
बहाना
चाहता
हूँ
तेरे
ख़्वाबों
में
आना
चाहता
हूँ
यही
ख्वाहिश
है
मैं
पल्लू
में
तेरे
घड़ी
अपनी
फँसाना
चाहता
हूँ
मुझे
दिल
के
किसी
कोने
में
रख
लो
मैं
तुमको
याद
आना
चाहता
हूँ
नया
सा
दिल
बनाकर
दे
मुझे
जो
इक
ऐसा
कार-ख़ाना
चाहता
हूँ
जो
मेरे
पास
आना
चाहते
हैं
उन्हीं
से
दूर
जाना
चाहता
हूँ
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Amaan Pathan
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ग़मों
की
नमी
भी
फिर
उड़ने
लगेगी
चराग़
एक
दिल
में
जलाओ
कभी
तुम
Amaan Pathan
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आशिक़ी
सिर्फ़
रुसवाई
देती
है
और
आशिक़ों
का
कोई
मक़बरा
भी
नहीं
Amaan Pathan
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अब
न
घर
टूटे
किसी
'आशिक़
का
मौला
मैं
बस
अपना
घर
बसाना
चाहता
हूँ
Amaan Pathan
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बाद
उसके
कोई
जचा
ही
नहीं
इश्क़
जैसी
कोई
बला
ही
नहीं
उसने
जब
बात
की
समझ
आया
ख़ामुशी
से
बड़ी
सज़ा
ही
नहीं
पूरी
बोतल
उतार
दी
गले
से
मुझ
को
फिर
भी
नशा
हुआ
ही
नहीं
उस
ने
यूँँ
छील
के
उतारी
हिना
रंग
फिर
कोई
भी
रचा
ही
नहीं
इन
लरज़ते
लबों
से
क्यूँँ
तूने
सुर्ख़
आँखों
को
फिर
छुआ
ही
नहीं
ईद
भी
आ
गई
मिरे
मौला
मेरा
घर
अब
तलक
सजा
ही
नहीं
उस
को
लौटा
सके
जो
बाँहों
में
ऐसा
तो
कोई
मो'जिज़ा
ही
नहीं
जो
दिया
सच
की
आग
से
रौशन
वो
तो
दरिया
से
भी
बुझा
ही
नहीं
आज
भूखे
ही
सो
गए
बच्चे
आज
कासा
मिरा
भरा
ही
नहीं
आग
ऐसी
अमान
देखी
है
पास
हो
कर
भी
मैं
जला
ही
नहीं
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Amaan Pathan
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