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Abha sethi
kare dil sard ik maah ae december ye
kare dil sard ik maah ae december ye | करे दिल सर्द इक माह ए दिसम्बर ये
- Abha sethi
करे
दिल
सर्द
इक
माह
ए
दिसम्बर
ये
सितम
उस
पे
हैं
तेरी
यादों
के
झोंके
- Abha sethi
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सुतून-ए-दार
पे
रखते
चलो
सरों
के
चराग़
जहाँ
तलक
ये
सितम
की
सियाह
रात
चले
Majrooh Sultanpuri
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जो
अंजान
थे
वो
मेरे
यार
निकले
मगर
जो
भी
अपने
थे
बेकार
निकले
ज़मीं
खा
गई
उन
वफ़ाओं
को
आख़िर
सितम
ये
हुआ
हम
गुनहगार
निकले
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Hameed Sarwar Bahraichi
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यूँँ
ही
हमेशा
उलझती
रही
है
ज़ुल्म
से
ख़ल्क़
न
उनकी
रस्म
नई
है,
न
अपनी
रीत
नई
यूँँ
ही
हमेशा
खिलाए
हैं
हमने
आग
में
फूल
न
उनकी
हार
नई
है,
न
अपनी
जीत
नई
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Faiz Ahmad Faiz
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जाने
क्या
क्या
ज़ुल्म
परिंदे
देख
के
आते
हैं
शाम
ढले
पेड़ों
पर
मर्सिया-ख़्वानी
होती
है
Afzal Khan
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रोने
को
तो
ज़िंदगी
पड़ी
है
कुछ
तेरे
सितम
पे
मुस्कुरा
लें
Firaq Gorakhpuri
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टक
गोर-ए-ग़रीबाँ
की
कर
सैर
कि
दुनिया
में
उन
ज़ुल्म-रसीदों
पर
क्या
क्या
न
हुआ
होगा
Meer Taqi Meer
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ख़याल
में
भी
उसे
बे-रिदा
नहीं
किया
है
ये
ज़ुल्म
मुझ
सेे
नहीं
हो
सका
नहीं
किया
है
Ali Zaryoun
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इस
गए
साल
बड़े
ज़ुल्म
हुए
हैं
मुझ
पर
ऐ
नए
साल
मसीहा
की
तरह
मिल
मुझ
से
Sarfraz Nawaz
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पूरी
कायनात
में
एक
क़ातिल
बीमारी
की
हवा
हो
गई
वक़्त
ने
कैसा
सितम
ढाया
कि
दूरियाँ
ही
दवा
हो
गईं
Unknown
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तबक़ों
में
रंग-ओ-नस्ल
के
उलझा
के
रख
दिया
ये
ज़ुल्म
आदमी
ने
किया
आदमी
के
साथ
Bakhtiyar Ziya
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ये
ज़िन्दगी
ग़मगीन
है
ले
साध
वो
परवीन
है
क्या
ही
मज़ा
बिन
इनके
भी
सुख
दुख
ही
तो
जुद्रीन
है
झुमके
बना
दुख
टाँगे
जब
दिल
तब
से
ही
ये
क्लीन
है
खेलो
न
इस
इक
ज़ीस्त
से
मिलती
नहीं
दो
तीन
है
होगा
न
अब
बेरंग
कुछ
चश्मा
मिरा
रंगीन
है
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Abha sethi
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झुमके
बना
दुख
टाँगे
जब
दिल
तब
से
ही
ये
क्लीन
है
Abha sethi
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ख़त
नहीं
लिफ़ाफ़े
में
है
भरा
गुलाबों
से
इश्क़
है
ये
बेहद
जो
तुम
को
मैंने
भेजा
है
Abha sethi
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चढ़ाया
सर
न
इनको
तो
कभी
भी
रखी
हैं
ख़्वाहिशें
महदूद
अपनी
Abha sethi
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ओढ़
के
तन
इश्क़
तेरा
इश्क़
का
पारा
चखेंगें
Abha sethi
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